भारतीय दर्शन में यदि किसी एक सिद्धांत ने मानव जीवन को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वह है कर्म सिद्धांत। यह सिद्धांत न केवल धार्मिक विश्वासों की नींव है, बल्कि मानव के नैतिक आचरण, उत्तरदायित्व और जीवन-दृष्टि को भी गहराई से प्रभावित करता है। कर्म सिद्धांत यह समझाने का प्रयास करता है कि मनुष्य जो कुछ भी करता है—विचार से लेकर कार्य तक—उसका कोई न कोई परिणाम अवश्य होता है। यह परिणाम कभी तत्काल दिखाई देता है, तो कभी समय के गर्भ में छिपा रहता है।
कर्म सिद्धांत का मूल संदेश अत्यंत स्पष्ट है—मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। न तो कोई ईश्वर मनमाने ढंग से सुख-दुःख देता है और न ही जीवन की घटनाएँ संयोग मात्र हैं। प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक परिस्थिति किसी न किसी कर्म की परिणति होती है।
‘कर्म’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—कार्य। परंतु भारतीय दर्शन में कर्म का अर्थ केवल शारीरिक क्रिया तक सीमित नहीं है। इसमें मन, वाणी और शरीर—तीनों के द्वारा किए गए कार्य सम्मिलित होते हैं। अर्थात जो हम सोचते हैं, जो बोलते हैं और जो करते हैं—सब कर्म की श्रेणी में आते हैं।
कर्म सिद्धांत यह मानता है कि कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। हर कर्म अपने साथ एक सूक्ष्म प्रभाव छोड़ता है, जो समय आने पर फल के रूप में प्रकट होता है। यही कारण है कि कई बार हम बिना स्पष्ट कारण के सुख या दुःख का अनुभव करते हैं—क्योंकि उन अनुभवों का संबंध हमारे वर्तमान जीवन से नहीं, बल्कि पूर्व कर्मों से होता है।
कर्म के तीन प्रमुख प्रकार
भारतीय दर्शन में कर्मों को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया गया है—संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म और क्रियमाण कर्म। इन तीनों को समझे बिना कर्म सिद्धांत को पूर्ण रूप से समझना संभव नहीं है।
1. संचित कर्म : अतीत का विशाल भंडार
संचित कर्म वे कर्म हैं, जो मनुष्य ने अपने वर्तमान और पूर्व जन्मों में किए हैं और जिनका फल अभी प्राप्त नहीं हुआ है। इन्हें कर्मों का संचित भंडार कहा जा सकता है। यह भंडार इतना विशाल होता है कि इसका संपूर्ण फल एक ही जीवन में भोगा जाना संभव नहीं होता।
संचित कर्म बीज के समान होते हैं, जो उचित परिस्थितियाँ मिलने पर अंकुरित होते हैं। ये कर्म यह निर्धारित करते हैं कि व्यक्ति को किस योनि में जन्म मिलेगा, उसकी प्रवृत्तियाँ कैसी होंगी और जीवन की दिशा क्या होगी। परंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि संचित कर्म केवल संभावना उत्पन्न करते हैं, अनिवार्यता नहीं।
2. प्रारब्ध कर्म : वर्तमान जीवन की पटकथा
संचित कर्मों में से जो कर्म इस जीवन में फल देने के लिए चुने जाते हैं, वही प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं। प्रारब्ध कर्म को ही सामान्यतः लोग ‘भाग्य’ कह देते हैं। जन्म, परिवार, शरीर, स्वास्थ्य, जीवन की प्रमुख परिस्थितियाँ—ये सभी प्रारब्ध कर्मों के प्रभाव से निर्धारित होती हैं।
प्रारब्ध कर्म को भोगना अनिवार्य माना गया है। जैसे छोड़ा हुआ तीर लक्ष्य तक पहुँचता ही है, वैसे ही प्रारब्ध कर्म अपना फल देकर ही शांत होता है। परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य असहाय है। प्रारब्ध जीवन की सीमाएँ तय करता है, परंतु उन सीमाओं के भीतर मनुष्य के पास कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है।
3. क्रियमाण कर्म : वर्तमान का निर्माण
क्रियमाण कर्म वे कर्म हैं, जो मनुष्य वर्तमान क्षण में करता है। यही कर्म भविष्य का निर्माण करते हैं। आज किए गए कर्म ही कल के संचित कर्म बन जाते हैं। यही वह क्षेत्र है जहाँ मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा और नैतिकता का महत्व सबसे अधिक है।
क्रियमाण कर्म के माध्यम से मनुष्य न केवल अपने भविष्य को सुधार सकता है, बल्कि कई बार प्रारब्ध के प्रभाव को भी कमजोर कर सकता है। सद्कर्म, सेवा, संयम और आत्मचिंतन के द्वारा व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है।
कर्म और स्वतंत्र इच्छा का संबंध
एक सामान्य प्रश्न यह उठता है कि यदि सब कुछ कर्मों से निर्धारित है, तो मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा का क्या महत्व है? कर्म सिद्धांत इसका संतुलित उत्तर देता है। यह मानता है कि भूतकाल कर्मों द्वारा निर्धारित है, वर्तमान स्वतंत्र है और भविष्य निर्माणाधीन है।
मनुष्य अपने वर्तमान कर्मों के माध्यम से अपने जीवन को अर्थपूर्ण बना सकता है। यही कारण है कि भारतीय दर्शन कभी निराशावाद को स्वीकार नहीं करता। कर्म सिद्धांत मनुष्य को उत्तरदायित्व का बोध कराता है—यदि जीवन में दुःख है, तो उसके कारणों को खोजो; यदि सुख चाहिए, तो उसके अनुरूप कर्म करो।
कर्म सिद्धांत और नैतिक जीवन
कर्म सिद्धांत केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि नैतिक जीवन का आधार भी है। यह मनुष्य को यह सिखाता है कि कोई भी कर्म बिना परिणाम के नहीं होता। छल, हिंसा, अहंकार और स्वार्थ चाहे तत्काल लाभ दें, परंतु अंततः दुःख का कारण बनते हैं। वहीं सत्य, करुणा, सेवा और संयम भले ही कठिन प्रतीत हों, परंतु दीर्घकाल में सुख और शांति प्रदान करते हैं।
यह सिद्धांत मनुष्य को बाहरी नियंत्रण के स्थान पर आत्मनियंत्रण की ओर प्रेरित करता है। जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि वह स्वयं अपने सुख-दुःख का कारण है, तब वह दूसरों को दोष देना छोड़ देता है और आत्मविश्लेषण की ओर अग्रसर होता है।
मोक्ष और कर्मों से मुक्ति
कर्म सिद्धांत का अंतिम लक्ष्य केवल सुख-दुःख की व्याख्या नहीं, बल्कि कर्मबंधन से मुक्ति है। जब तक मनुष्य कर्म करता है और उनके फलों की आसक्ति रखता है, तब तक वह जन्म-मरण के चक्र में बंधा रहता है। जब वह निष्काम भाव से कर्म करने लगता है, तब कर्म बंधन का कारण नहीं बनते।
यही स्थिति मोक्ष की ओर ले जाती है—जहाँ कर्म तो होते हैं, परंतु उनका संचित नहीं होता। यह अवस्था आत्मज्ञान, वैराग्य और विवेक से प्राप्त होती है।
क्या आपने कभी सोचा है कि आपका आज का निर्णय कल का प्रारब्ध बन सकता है? आप अपने क्रियमाण कर्मों को किस दिशा में ले जा रहे हैं?
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“ज्ञानार्थं प्रवृत्तिः”
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ॐ नमः शिवाय