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सप्तऋषि कौन हैं? सात महान ऋषियों के नाम, जन्म और उनका इतिहास | Saptarishi Names and History in Hindi

सप्तऋषि - सनातन धर्म के सात महान ऋषि

🚩 सप्तऋषि: सनातन धर्म के सात महान दिव्य ऋषि 🚩

ब्रह्मा के मानस पुत्र और मानवता के मार्गदर्शक

सनातन धर्म में सप्तऋषि उन सात ऋषियों को कहा जाता है, जिन्हें ब्रह्मा जी ने अपने मानस से उत्पन्न किया था। ये ऋषि न केवल ज्ञान के भंडार हैं, बल्कि वे काल के चक्र को सुचारू रूप से चलाने और मानवता को धर्म का मार्ग दिखाने के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं। वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर के सात ऋषियों का विस्तृत परिचय नीचे दिया गया है।

सप्तऋषियों का परिचय एवं योगदान

1. कश्यप ऋषि: सृष्टि के पितामह

महर्षि कश्यप को 'सृष्टि का आधार' माना जाता है। वे ब्रह्मा जी के मानस पुत्र मरीचि के पुत्र हैं। उनकी महिमा इतनी विशाल है कि उन्हें 'प्रजापति' की उपाधि दी गई है। कश्यप ऋषि की 13 पत्नियों से ही इस जगत के सभी प्राणियों—देवता, दानव, नाग, पक्षी और मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, इसलिए वे समस्त चराचर जगत के पितामह कहलाते हैं।

भगवान विष्णु के वामन अवतार ने महर्षि कश्यप और माता अदिति के घर ही पुत्र रूप में जन्म लिया था। पौराणिक इतिहास के अनुसार, आज का 'कश्मीर' उन्हीं की तपस्थली रही है और उन्हीं के नाम पर इस सुंदर घाटी का नामकरण हुआ है। उन्होंने 'कश्यप स्मृति' और 'कश्यप संहिता' जैसे महान ग्रंथों की रचना की, जो आज भी धर्म और आयुर्वेद का मार्गदर्शन करते हैं।

हिंदू धर्म में कश्यप गोत्र का विशेष महत्व है; यदि किसी को अपना गोत्र ज्ञात न हो, तो उसे 'कश्यप गोत्र' का माना जाता है क्योंकि मूलतः हम सभी उन्हीं की संतानें हैं। जब भगवान परशुराम ने समस्त पृथ्वी जीत ली थी, तब उन्होंने शांति स्थापित करने के लिए पूरी धरती महर्षि कश्यप को ही दान में दे दी थी।

2. अत्रि ऋषि: तप और ज्ञान के पुंज

महर्षि अत्रि ब्रह्मा जी के नौ मानस पुत्रों में से एक हैं और सप्तऋषियों में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी धर्मपत्नी माता अनुसूया थीं, जिन्हें संसार की सबसे महान पतिव्रता स्त्री माना जाता है। महर्षि अत्रि ने ही ऋग्वेद के पांचवें मंडल की रचना की थी, जिसे 'अत्रि मंडल' भी कहा जाता है।

अत्रि ऋषि की तपस्या और माता अनुसूया के सतीत्व से प्रसन्न होकर त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) ने उनके घर पुत्र रूप में जन्म लिया था। भगवान दत्तात्रेय (विष्णु अंश), महर्षि दुर्वासा (शिव अंश) और चंद्रमा (ब्रह्मा अंश) इन्हीं की संतानें हैं। वनवास के दौरान जब भगवान श्री राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ उनके आश्रम पहुँचे, तब महर्षि अत्रि और माता अनुसूया ने ही उन्हें दिव्य ज्ञान और सीता जी को दिव्य वस्त्र प्रदान किए थे।

खगोल विज्ञान और ज्योतिष में भी महर्षि अत्रि का बड़ा योगदान है; माना जाता है कि उन्होंने ही सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण के गणित को सबसे पहले समझा था। आयुर्वेद में 'अत्रि संहिता' का विशेष स्थान है। वे एक ऐसे ऋषि हैं जिन्होंने अपनी तपस्या से न केवल देवताओं को बल्कि प्रकृति को भी प्रभावित किया। आज भी आकाश में सप्तऋषि मंडल के रूप में वे मानवता का मार्गदर्शन कर रहे हैं।

3. भारद्वाज ऋषि: ज्ञान और विज्ञान के पुरोधा

महर्षि भारद्वाज को सनातन धर्म के सबसे महान विद्वानों में गिना जाता है। वे देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे और ऋग्वेद के छठे मंडल के प्रमुख दृष्टा ऋषि हैं। भारद्वाज ऋषि केवल एक आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि एक महान वैज्ञानिक और आयुर्वेद के आचार्य भी थे। इंद्र देव ने उन्हें ही आयुर्वेद का संपूर्ण ज्ञान प्रदान किया था, जिसे उन्होंने बाद में धन्वंतरि और अन्य ऋषियों तक पहुँचाया।

उनकी सबसे विस्मयकारी रचना 'यंत्र सर्वस्व' मानी जाती है, जिसके अंतर्गत 'वैमानिक शास्त्र' आता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, महर्षि भारद्वाज ने ही आकाश में उड़ने वाले विमानों के निर्माण और उनके संचालन की तकनीक का वर्णन किया था। रामायण काल में उनका आश्रम प्रयागराज (प्रयाग) में था, जिसे उस समय का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र माना जाता था। भगवान श्री राम ने वनवास के दौरान उनके आश्रम में विश्राम कर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त किया था।

महर्षि भारद्वाज का योगदान राजनीति और अर्थशास्त्र में भी अतुलनीय है; उनके द्वारा रचित 'भारद्वाज नीति' राजाओं के लिए शासन का आधार रही है। द्रोणाचार्य इन्हीं के पुत्र थे, जिन्हें इन्होंने धनुर्विद्या और शास्त्रों का गुप्त ज्ञान दिया था। वे एक ऐसे ऋषि हैं जिन्होंने धर्म के साथ-साथ व्यावहारिक विज्ञान और कलाओं को भी समाज के उत्थान के लिए विकसित किया।

4. विश्वामित्र ऋषि: पुरुषार्थ और संकल्प के महानायक

महर्षि विश्वामित्र का जीवन इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने दृढ़ संकल्प और कठोर तपस्या से अपना भाग्य स्वयं बदल सकता है। वे पहले राजा 'कौशिक' थे, लेकिन महर्षि वशिष्ठ की ब्रह्मशक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने राजसी सुख त्याग दिया और हज़ारों वर्षों की कठिन साधना के बाद 'राजर्षि' से 'ब्रह्मर्षि' का पद प्राप्त किया। सनातन धर्म का सबसे शक्तिशाली मंत्र, गायत्री मंत्र, इन्हीं की देन है, जिसके दृष्टा स्वयं विश्वामित्र जी ही हैं।

त्रेतायुग के इतिहास में महर्षि विश्वामित्र का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने ही अयोध्या के राजकुमार श्री राम और लक्ष्मण को अपने साथ ले जाकर उन्हें 'बला' और 'अतिबला' जैसी दिव्य विद्याओं और अमोघ अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्रदान किया था। उन्हीं के मार्गदर्शन में प्रभु राम ने ताड़का, सुबाहु जैसे भयंकर राक्षसों का वध किया और मिथिला में शिव धनुष तोड़कर माता सीता के साथ विवाह बंधन में बंधे।

महर्षि विश्वामित्र की शक्ति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राजा त्रिशंकु के लिए अपनी तपस्या के बल पर एक 'नई सृष्टि' की रचना शुरू कर दी थी। ऋग्वेद के तीसरे मंडल की रचना इन्हीं के द्वारा की गई है। उनका चरित्र हमें सिखाता है कि अहंकार को त्यागकर यदि सच्चे मन से साधना की जाए, तो मनुष्य असंभव को भी संभव कर सकता है।

5. गौतम ऋषि: न्याय शास्त्र के प्रणेता

महर्षि गौतम का नाम सनातन धर्म के सबसे महान तर्कशास्त्रियों और तपस्वियों में गिना जाता है। वे 'न्याय दर्शन' (Logic) के जनक माने जाते हैं, जिन्होंने दुनिया को तर्क और सत्य की कसौटी पर परखने का ज्ञान दिया। उनकी पत्नी माता अहिल्या थीं, जो अपने सतीत्व और धैर्य के लिए प्रसिद्ध हैं। महर्षि गौतम की तपस्या इतनी प्रचंड थी कि उनके आश्रम का वातावरण हमेशा शांत और दिव्य बना रहता था।

गौतम ऋषि का सबसे महान उपकार दक्षिण भारत पर माना जाता है। उन्होंने ही अपनी कठिन तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न किया और ब्रह्मा जी के कमंडल से निकलने वाली गंगा की एक धारा को पृथ्वी पर लाए, जिसे आज हम 'गोदावरी' नदी के नाम से जानते हैं। इसीलिए गोदावरी को 'गौतमी' भी कहा जाता है। उन्होंने ही 'गौतम धर्मसूत्र' की रचना की, जो हिंदू कानून और आचार संहिता के सबसे प्राचीन और प्रामाणिक स्रोतों में से एक है।

रामायण के अनुसार, महर्षि गौतम और अहिल्या के पुत्र शतानंद जी राजा जनक के कुलगुरु थे। महर्षि गौतम का जीवन हमें अनुशासन, न्यायप्रियता और समाज के कल्याण के लिए प्रकृति को संतुलित करने की प्रेरणा देता है। वे ऋग्वेद के कई सूक्तों के दृष्टा ऋषि हैं और उनका ज्ञान आज भी भारतीय दर्शन शास्त्र का आधार बना हुआ है।

6. जमदग्नि ऋषि: तप और तेज के प्रतिमूर्ति

महर्षि जमदग्नि भृगुवंशी ऋषि ऋचीक के पुत्र और भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के पिता हैं। वे सप्तऋषियों में अपने कठोर अनुशासन और अद्वितीय तपोबल के लिए विख्यात हैं। उन्होंने वेदों का इतना गहन अध्ययन किया था कि उन्हें 'जमदग्नि' कहा गया, जिसका अर्थ है 'प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी'। उनकी पत्नी राजा प्रसेनजित की पुत्री माता रेणुका थीं।

महर्षि जमदग्नि का आश्रम शिक्षा और साधना का एक पवित्र केंद्र था। उनके पास कामधेनु गाय थी, जो समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली थी। इसी दिव्य गाय को प्राप्त करने के लोभ में जब अहंकारी राजा कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रबाहु) ने छल किया, तब महर्षि जमदग्नि ने विचलित हुए बिना धर्म का मार्ग चुना। उनके वध का प्रतिशोध लेने के लिए ही भगवान परशुराम ने पृथ्वी को अधर्मी क्षत्रियों से विहीन करने का संकल्प लिया था।

आयुर्वेद और अस्त्र-शस्त्र के ज्ञान में भी उनका बड़ा योगदान है। उन्होंने समाज को सिखाया कि एक ऋषि का धर्म केवल शांति ही नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी है। ऋग्वेद के नौवें मंडल के कई सूक्तों की रचना महर्षि जमदग्नि ने की है। उनका जीवन त्याग, तपस्या और सत्य के प्रति अडिग रहने की प्रेरणा देता है।

7. वशिष्ठ ऋषि: रघुकुल के पथ-प्रदर्शक

महर्षि वशिष्ठ ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और महान सम्राट इक्ष्वाकु के कुलगुरु थे। वे शांति, क्षमा और अगाध ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं। उनके पास दिव्य 'नंदिनी' गाय (कामधेनु की पुत्री) थी। वशिष्ठ ऋषि ने ही रघुकुल के राजाओं को वह संस्कार दिए, जिससे आगे चलकर 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम' जैसा व्यक्तित्व समाज को मिल सका। वे केवल एक पुरोहित नहीं, बल्कि एक महान राजनैतिक सलाहकार और आध्यात्मिक गुरु भी थे।

वशिष्ठ ऋषि के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उनका महान ग्रंथ 'योग वशिष्ठ' है। जब किशोर अवस्था में श्री राम के मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ था, तब महर्षि वशिष्ठ ने ही उन्हें जो उपदेश दिया, वही 'योग वशिष्ठ' के रूप में प्रसिद्ध हुआ। यह ग्रंथ आज भी अद्वैत वेदांत और मनोविज्ञान का सबसे गहरा स्रोत माना जाता है। उन्होंने ही ऋग्वेद के सातवें मंडल की रचना की थी, जिसे 'वशिष्ठ मंडल' कहा जाता है।

महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच का संवाद और उनकी परीक्षाएँ सनातन साहित्य की अद्भुत कथाएँ हैं, जो हमें सिखाती हैं कि क्रोध पर विजय पाना ही असली ब्रह्मत्व है। उन्होंने 'वशिष्ठ स्मृति' और 'वशिष्ठ संहिता' के माध्यम से समाज को धर्म और आचार-व्यवहार की शिक्षा दी। रघुकुल की कीर्ति और श्री राम के गौरव में महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन का सबसे बड़ा योगदान रहा है।

सप्तऋषि मंडल का दर्शन

रात्रि के आकाश में उत्तर दिशा में दिखने वाले सात तारों का समूह (सप्तऋषि मंडल) हमें इन्हीं ऋषियों की याद दिलाता है। वे ब्रह्मांड के संतुलन को बनाए रखने के लिए आज भी तपस्यारत माने जाते हैं।

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"सादर नमन - ऋषिवर"

॥ ऋषि देवो भवः ॥

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