भारतीय दर्शन केवल बौद्धिक विचारधारा नहीं है, बल्कि यह जीवन को समझने, जीने और मोक्ष की ओर अग्रसर होने की एक समग्र प्रणाली है। इसमें आत्मा, परमात्मा, कर्म, पुनर्जन्म, धर्म और मोक्ष जैसे गूढ़ विषयों पर गहन चिंतन किया गया है। ऐतिहासिक विकास के आधार पर भारतीय दर्शन को चार प्रमुख कालों में विभाजित किया जाता है।
1. वैदिक काल
वैदिक काल भारतीय दर्शन की आधारशिला है। इस काल में दर्शन का विकास धार्मिक अनुष्ठानों, यज्ञों और देव-उपासना के माध्यम से हुआ। प्रारंभ में प्रकृति शक्तियों की आराधना की गई, परंतु धीरे-धीरे चिंतन आंतरिक और आध्यात्मिक होता गया।
उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म की एकता का सिद्धांत प्रस्तुत हुआ। “अहं ब्रह्मास्मि” और “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्य इसी काल की देन हैं। कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष की अवधारणा ने मानव जीवन को नैतिक और आध्यात्मिक दिशा प्रदान की।
2. महाकाव्य काल
महाकाव्य काल में दर्शन जनसामान्य के लिए सुलभ बना। इस काल में दार्शनिक विचार कथाओं, पात्रों और जीवन प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत किए गए। धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और नैतिकता को व्यवहारिक रूप में समझाया गया।
इस काल की सबसे बड़ी विशेषता कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का समन्वय है। दर्शन अब केवल साधुओं और विद्वानों तक सीमित न रहकर गृहस्थ जीवन का मार्गदर्शक बन गया।
3. सूत्र काल
सूत्र काल भारतीय दर्शन का सबसे व्यवस्थित और शास्त्रीय चरण माना जाता है। इस काल में दर्शन को संक्षिप्त सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिनकी व्याख्या भाष्यों और टीकाओं के माध्यम से की गई।
न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत—इन छह दर्शनों ने तर्क, प्रमाण, ज्ञान और मोक्ष के मार्गों का विश्लेषण किया। यह काल दर्शन को बौद्धिक अनुशासन और तार्किक मजबूती प्रदान करता है।
4. वर्तमान तथा समसामयिक काल
समसामयिक काल में भारतीय दर्शन ने आधुनिक समस्याओं से संवाद स्थापित किया। विज्ञान, मानवाधिकार, सामाजिक समानता और वैश्विक शांति जैसे विषयों को दर्शन से जोड़ा गया।
इस काल में प्राचीन वेदांत और उपनिषदों की आधुनिक व्याख्या हुई। भारतीय दर्शन अब केवल भारत तक सीमित न रहकर विश्व-मानवता के लिए एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन बन गया है।
समग्र निष्कर्ष
भारतीय दर्शन की यात्रा वैदिक चिंतन से प्रारंभ होकर महाकाव्यात्मक लोकबोध, सूत्रात्मक तर्क और आधुनिक वैश्विक दृष्टि तक पहुँची है। यह दर्शन आज भी मानव जीवन को उद्देश्य, संतुलन और शांति प्रदान करता है।
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“ज्ञानार्थं प्रवृत्तिः”
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