प्रकृति के साथ जुड़ाव और आध्यात्मिक परिवर्तन का उत्सव
भारत में कुछ पर्व ऐसे होते हैं जो केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते को याद दिलाते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है जो हमें बताता है कि परिवर्तन केवल जीवन का नियम नहीं, बल्कि उसका उत्सव भी है।
☀️ मकर संक्रांति का वास्तविक अर्थ
‘मकर’ का अर्थ है मकर राशि और ‘संक्रांति’ का मतलब होता है संक्रमण या परिवर्तन। जिस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है, उसी दिन को मकर संक्रांति कहा जाता है।
यह पर्व चंद्रमा की तिथि पर नहीं, बल्कि सूर्य की वास्तविक गति पर आधारित है, इसीलिए यह लगभग हर वर्ष 14 जनवरी को ही आता है।
🌓 सूर्य का उत्तरायण: अंधकार से प्रकाश की ओर
मकर संक्रांति के साथ सूर्य का उत्तरायण आरंभ होता है। दक्षिणायन के बाद सूर्य की दिशा उत्तर की ओर होती है, जिससे दिन धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी। भारतीय परंपरा में इसे 'देवताओं का दिन' और आध्यात्मिक जागरण का संकेत माना गया है।
📜 पौराणिक महिमा (Pauranik Space)
१. भीष्म पितामह और मोक्ष: कुरुक्षेत्र के महासमर में जब अर्जुन के तीक्ष्ण बाणों से विद्ध होकर भीष्म पितामह शरशय्या पर आ गिरे, तब यह किसी साधारण योद्धा की पराजय नहीं थी। शरीर घायल था, पर आत्मबल अडिग। भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था—वे जब चाहें, तभी प्राण त्याग सकते थे। किंतु उस समय सूर्य दक्षिणायन में था, जिसे शास्त्रों में देह त्याग के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है। इसलिए उन्होंने उसी क्षण मृत्यु को स्वीकार न कर, उत्तरायण की प्रतीक्षा करने का दृढ़ संकल्प लिया।
बाणों की शय्या पर लेटे हुए दिन-रात असह्य पीड़ा सहना, कड़कती ठंड और युद्ध की विभीषिका—इन सबके बीच भी भीष्म पितामह का धैर्य डगमगाया नहीं। यही नहीं, उसी अवस्था में उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म, आपद्धर्म, दान, नीति और शासन के गूढ़ रहस्य समझाए। यह दृश्य स्वयं में एक शिक्षा है—कि सच्चा ज्ञानी विपरीत परिस्थितियों में भी मार्गदर्शन देना नहीं छोड़ता और पीड़ा के क्षणों में भी लोककल्याण को प्राथमिकता देता है।
अंततः जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करता है, तब भीष्म पितामह अपने मन और प्राणों को ब्रह्म में स्थिर कर, पूर्ण शांति के साथ देह का त्याग करते हैं। यह मृत्यु किसी अंत का संकेत नहीं थी, बल्कि एक महान आदर्श की स्थापना थी—कि त्याग यदि सही समय, सही भाव और धर्म के अनुरूप हो, तो वही मोक्ष का द्वार बनता है।
उत्तरायण में भीष्म पितामह का प्राणत्याग हमें यह सिखाता है कि जीवन में कर्तव्य सबसे ऊपर है, और मृत्यु भी यदि धर्म के मार्ग पर हो, तो वह भय का कारण नहीं, बल्कि परम शांति की ओर ले जाने वाली यात्रा बन जाती है।
२. पिता-पुत्र का मिलाप: मकर संक्रांति केवल सूर्य के राशि परिवर्तन का पर्व नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, संबंधों और क्षमा का भी गहरा संदेश देता है। इसी दिन से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक कथा है—सूर्यदेव और उनके पुत्र शनिदेव के मिलन की।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सूर्यदेव और शनिदेव का संबंध सहज नहीं था। सूर्यदेव तेज, प्रकाश और ऊर्जा के प्रतीक हैं, जबकि शनिदेव न्याय, अनुशासन और कर्मफल के देवता। पिता के प्रखर स्वभाव और पुत्र के कठोर तपस्वी जीवन के कारण दोनों के बीच दूरी बन गई। शनिदेव ने अपने जीवन में कठोर तप, संयम और साधना को अपनाया, वहीं सूर्यदेव अपने तेज और अहं से अनजाने में पुत्र की भावनाओं को समझ नहीं पाए।
कहा जाता है कि सूर्यदेव वर्ष भर आकाश में भ्रमण करते हैं, लेकिन मकर संक्रांति के दिन वे मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जो कि शनिदेव की राशि मानी जाती है। यह प्रवेश केवल ज्योतिषीय घटना नहीं, बल्कि एक पिता का अपने पुत्र के घर जाना है। सूर्यदेव इस दिन अपने तेज को संयमित कर, अहं को त्यागकर, शनिदेव के धाम में प्रवेश करते हैं।
यह मिलन दिखाता है कि चाहे कितनी ही दूरी क्यों न आ जाए, रिश्तों में पहला कदम झुककर ही बढ़ता है। सूर्यदेव का यह आगमन पिता की ओर से स्वीकारोक्ति और स्नेह का प्रतीक है, जबकि शनिदेव का स्थिर भाव यह दर्शाता है कि न्याय और अनुशासन में भी करुणा का स्थान होता है।
इसी भाव के कारण मकर संक्रांति को क्षमा, दान और नए आरंभ का पर्व माना जाता है। तिल-गुड़ का सेवन भी यही संदेश देता है—जीवन में चाहे कड़वाहट क्यों न हो, वाणी और व्यवहार में मधुरता बनी रहनी चाहिए।
सूर्य और शनि का यह प्रतीकात्मक मिलन हमें सिखाता है कि अहंकार त्यागकर, समय के साथ संबंधों को संवारना ही सच्चा धर्म है। मकर संक्रांति इसलिए केवल एक खगोलीय घटना नहीं, बल्कि परिवार, संबंध और भावनात्मक संतुलन का पर्व बन जाती है।
✅ खरमास समाप्ति और मांगलिक कार्यों का उदय
मकर संक्रांति के साथ ही एक महीने से चल रहा 'खरमास' समाप्त हो जाता है। अब विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ और सभी शुभ अनुष्ठानों के द्वार खुल जाते हैं। इसे नव जीवन चक्र का प्रारंभ भी कहा जाता है।
🌏 एक पर्व, अनेक नाम - सांस्कृतिक एकता
- 🌾 तमिलनाडु: पोंगल
- 🔥 पंजाब: लोहड़ी
- 🪁 गुजरात: उत्तरायण
- 🍚 असम: बिहू
- 🍲 उत्तर भारत: खिचड़ी
- 🚩 महाराष्ट्र: संक्रांत
📅 पंचांग दृष्टि: १४ जनवरी २०२६ (बुधवार)
✅तिथि (Tithi): कृष्ण पक्ष षटतिला एकादशी ,
🌕सूर्योदय (Sunrise): लगभग 07:15 AM,
✅अभिजीत मुहूर्त (शुभ): दोपहर 11:47 AM से 12:29 PM तक (शुभ कार्यों के लिए उत्तम)।
| विशेष कार्य | आध्यात्मिक महत्व |
|---|---|
| पवित्र स्नान | पापों का क्षय और शांति |
| तिल-गुड़ दान | शनि-सूर्य की कृपा और मिठास |
| सूर्य अर्घ्य | तेज और आरोग्य की प्राप्ति |
✨ मकर संक्रांति का शाश्वत संदेश ✨
"सूर्य की तरह हमें भी सदैव आगे बढ़ते रहना चाहिए — तेजस्वी, सकारात्मक और निरंतर।"
🙏 आपका विचार: SanatanSankalp.in
"मकर संक्रांति का यह उत्सव आपके क्षेत्र में किस नाम से मनाया जाता है? हमें कमेंट्स में जरूर बताएं और 'जय सूर्यदेव' लिखना न भूलें!"

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ॐ नमः शिवाय